Wednesday, December 2, 2009

गम का सागर

बार-बार ऐसा क्यों होता है मेरा साथ
कोई देते-देते छोड़ देता है मेरा साथ
क्या जरूरत थी पत्थर दिल में हलचल मचाने की
क्यों खाई थी कसम तुमने हमें ना भुलाने की

क्या दोस्ती की तुमने हमें मिटाने को
कसर कहां छोड़ी थी हमने सिर कटाने को

प्यार की राह में चलकर हमें ना छोड़ देना
हम दोस्त हैं तुम्हारे दोस्तों का ना इम्तिहां लेना

धक्का लगा है हमको ये बात जानकर
चलने लगे हो तुम हमको दुश्मन मानकर

प्यार नहीं किया था हमने कभी
फिर भी जाने क्यों तुम रूठकर चली

इस जन्म में ना मिलो तो फिर कभी ना मिलना
क्यों कि आप जैसे धोखेबाजों से हमें नहीं मिलना

यादों का समुंदर

ले जा रहा हूं मैं तुमसे
छीन नहीं सकतीं तुम हमसे
सपनों का नगर है वो
यादों का समुंदर है वो
चाहता था रहना जिसमें
हो रहा हूं बर्बाद इसमें
फिर भी यादें जरूर रखूंगा अपने पास
ये यादें मुझे नहीं होने देंगी कभी उदास
खुशियां दीं तुमने मुझे पल- पल
भूल नहीं पाऊंगा मैं कल
सोचूंगा तुम थीं ठंडी हवा का झोंका
जो दे गया मुझे हमेशा के लिए धोखा
नाकाम कोशिशें कीं वो तुम्हें पाने की
कोशिश की तुम्हें जिंदगीभर को भुलाने की
कर ना सका मैं कुछ भी पहली बार
मेरी हर कोशिश होती गई बेकार
औरों की तरह नहीं था मुझे तुमसे प्यार
तुम्हारे साथ मैंने देखे थे सपने हजार
खुश हूं मैं तुम्हें खुश देखकर
देख लो एक बार तो सोचकर
तुम्हारी ही यादों में खोया रहता हूं हर पल
चाहे तुम ना सोचो मुझ पर एक पल

Wednesday, November 25, 2009

चुनाव आयोग को गहरी नींद से जगाने के लिए पत्र

आम लोगों की तरफ से आम लोगों के हित में चुनाव आयोग को संबोधित करते हुए पत्र । जो चुनाव आयोग को कुछ सुधारों के बाद भेजा जाना बॉकी है....। सभी मित्रों की तरफ से सुझाव और प्रतिक्रियाएं सादर आमंत्रित हैं, कोई भी प्रेषक में अपना नाम देना चाहे तो प्रतिक्रिया के साथ भेज सकता है धन्यवाद ।

सभी जानते हैं कि मनसे और शिवसेना की गुंडागिर्दी का चुनाव आयोग ने अभी तक अपनी तरफ से कोई संज्ञान नहीं लिया है, हालांकि मीडिया और देश की जनता दोनों ही दलों की दादागिरी की आलोचना कर रही है और देश की सभी राजनैतिक पार्टियों ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए मनसे और शिवसेना पर निशाना साधा है । साफ है कि मनसे और शिवसेना देश की अखंडता को ताक पर रखकर क्षेत्रीय उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहीं हैं, ऐसे में अगर इन्हें जल्द ही नहीं रोका गया तो तय है कि देश की एकता - अखंडता को खतरा है । शिवसेना और एमएनएस की तरफ से लगातार दिए जा रहे क्षेत्रीय उन्माद फैलाने वाले भाषण लोकतंत्र के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं । ऐसे में निसक्रिय चुनाव आयोग को सक्रियता दिखाते हुए इन दलों को बैन किए जाने की जरूरत है.....इस संबंध में आम आदमी की तरफ से आम आदमी के लिए http://aamaadmekiduniya.blogspot.com/ पर खत है जो चुनाव आयोग को लिखा गया है । ----------


सेवा में,
श्रीमान मुख्य चुनाव आयुक्त
भारत निर्वाचन आयोग
अशोक रोड, नई दिल्ली

विषयः शिवसेना और एमएनएस पर बैन लगाने और उनकी राजनैतिक पार्टी के रूप में मान्यता समाप्त करने हेतु ।

महोदय,

उपरोक्त विषय में आपसे निम्न निवेदन करना हैःकि -

*प्रार्थीगण लोकतांकत्रिक देश भारत के कुछ आमआदमी है और जिनकी भावनाएं एमएनएस और शिवसेना द्वारा किए जा रहे कामों से लगातार आहत हो रहीं हैं । इन दोनों ही संगठनों ने भारतीय नागरिक समाज में लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, क्षेत्र निरपेक्षता, सामाजिक सद्भाभाव, राष्ट्रीय एकता-अखंडता, राष्ट्रभावना, राष्ट्रभाषा, संविधान को ठोकरें मारने की जुर्रत की है । मुंबई में शिवसैनिकों और एमएनएस की गुंडागर्दी लगातार कई सालों से जारी है, इन दोनों दलों ने अभी तक ही अपनी काली करतूतों से लोकतंत्र का मजाक उड़ाया है और हद तो तब हो गई जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर भी शिवसैनिकों ने धावा बोल दिया । .इन दलों की अभी तक की हरकतें साफ बयां कर रही हैं कि इनके मंसूबे आतंकियों से कम खतरनाक नहीं । वहीं, पिछले दिनों एमएनएस ने महाराष्ट्र विधानसभा में मारपीट की.... यानी दोनों दल लोकतंत्र को निशाना बनाने की होड़ में एक दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं । और इन ओछी हरकतों से क्षेत्रीय सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं ।
* ये दल कभी राष्ट्रभाषा का अपमान करते हैं तो कभी, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पर हमला बोल देते हैं। खुलेआम संविधान और कानून की मर्यादा तार-तार हो रही है। लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई जा रहीं है । आए दिन दोनों दल लोकतंत्र, संविधान और कानून को ठोकर मार रहे हैं...। दोनों दल मराठियों और गैरमराठी भारतीयों के बीच द्वेष फैलाने का घृणित काम कर रहे हैं ।

*बाला साहब ठाकरे शिवसेना और राज ठाकरे एमएनएस के नामक संगठन के मुखिया हैं। और इन दोनों ही दलों का काम अब भारतीय नागरिक समाज में क्षेत्रीयता का जहर घोलना रह गया है । पिछले कई दिनों से इन्होंने सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी क्यों कि इससे इनके राजनैतिक हित की पूर्ति होती है । ऐसा करके दोनों नेता लोगों को भड़काते हैं और बलबा-फसाद जैसी अराजकता को बढ़ावा देते हैं ।मालूम होता है कि मराठी और गैरमराठी भारतीयों में वैमनस्यता पैदा करने की इन्होंने शपथ ले रखी है । और वक्त वक्त पर दोनों दल भाईचारे व साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले शब्दों का प्रयोग करते हैं ताकि लोगों को भड़काया जा सके ।

*एमएनएस और शिवसेना नेता सरेआम टीवी पर कई बार ऐसी बयानबाजी करते देखे जाते हैं, जिसे देखकर एक आम हिंदुस्तानी की भावनाएं आहत होतीं हैं । साबित होता है कि इनके नेताओं को ना तो बातचीत की तहजीब है और ना ही सलीका.....इतना ही नहीं, इन टीवी पर इनदलों के नेता साफ तौर से कहते हुए सुने जा सकते हैं कि इनके लिए राष्ट्रीयता से बड़ी क्षेत्रीयता है ।



*एमएनएस और शिवसेना दोनों ही दल संविधान में निहित अहिंसा की भावना से कोसों दूर हैं और हर एक समस्या का समाधान हिंसा में खोजने की कोशिश करते हैं । ऐसे में अगर इन्हें इन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाने लगा तो कानून व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा और देश की शांति और अमन चैन को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकेगा । खुद को मराठियों का हितैषी बताने वाले इन दलों के कार्यकर्ता आम पार्टी कार्यकर्ता ना रहकर गुंडे बन गए हैं । जो संविधान शास्त्र में नहीं बल्कि शस्त्र में यकीन रखते हैं और राष्ट् की व्यवस्था को तार तार करने की मनोवृत्ति रखने वाले हैं । इनकी बांतों और इनके नारों से साफ है कि सत्ता के लिए ये दल देश को किस मुहाने पर ले जाना चाहते हैं । इनके कार्यकर्ताओं की आस्था भारतीय संविधान से ज्यादा इनके नेताओं में हैं । जो गंभीर चिंता का बिषय है । जबकि भारतीय संविधान क्षेत्रवाद की भावना से नहीं बल्कि राष्ट्रवाद की विचारधारा की स्वीकृति देता है । क्षेत्रीयता की अंधी दौड़ में इन दलों ने राष्ट्रहित गिरवी रख दिया है और स्वार्थ की राजनीति में कूद पड़े हैं । साथ ही, राष्ट्रीय भावना का तिरस्कार कर रहे हैं

*महाराष्ट्र में मराठी के नाम पर शिवसेना और मनसे इस तरह से उन्माद फैला रहे हैं, जिससे देश भाषा या क्षेत्र के आधार पर टूट सकता है । माना जा सकता है कि शिवसेना और एमएनएस एक तरह से देश में आतंकवाद फैला रहे हैं। क्यों कि उन्माद आतंक का ही एर रूप है । एमएनएस और शिवसेना एक तरह का कुकृत्य कर रही है तो इसे रोकना जरुरी है इस पर राजनीति करने की कतई जरुरत नहीं है। क्योंकि आज की राजनीति कल की भावी पीढ़ी के लिए अभिशाप बन सकती है।

* शिवसेना हार की हताशा में ऊल जलूल भाषणबाजी कर लोगों को भड़काने में आगे है । जो कि समाज के हर वर्ग के सद्भाव के लिए घातक है । इनके कार्यकर्ता जहां मनचाहे तोड़फोड़ करते हैं सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं । समाज में दूषित क्षेत्रीयता का जहर घोलते हैं ।

*शिवसेना और एमएनएस की लोलुपता किसी से छुपी नहीं है । देश के नौजवानों को सही सत्ता के रास्ते पर आगे बढ़ाने की बजाये इन दलों के नेता युवाओं का युवा शक्ति का अपने खुद के हितों के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं । महाराष्ट्र का युवा गुमराह हो रहा है । इन दलों के नेता खुद सत्ता छोड़ना नहीं चाहते और आम युवा को पार्टी का उत्तराधिकार नहीं देना चाहते । इसलिए उनका इस्तेमाल गैर जरूरी मुद्दों में कर ध्यान बंटाना चाहते हैं । प्रदेश के युवाओं का सिर्फ राजनैतिक इस्तेमाल हो रहा है । परिवारवाद हावी है । दोनों दलों के प्रमुखों में आजीवन पार्टी सुप्रीमो बने रहने की चाह है ।

*इन दलों के कुछ कार्यकर्ताओँ में गहराई तक इतनी ज्यादा नफरत भरी जा चुकी है जिसे जल्द निकाल पाना आसान नहीं । दोनों दलों के नेताओं के चंगुल से इनके कार्यकर्ताओँ को बचाने के लिए भी एक ही उपाय नजर आता है कि इन्हे जल्द ही बैन किया जाए । नहीं तो, अपने दलों को ताकतवर बनाने के लिए दोनों दल के नेता हर मराठी के हाथ में हथियार थमा देंगे ।


*वैसे एमएनएस और शिवसेना लोगों के मौलिक अधिकारों, देश के नीति निर्देशक तत्व और मूल कर्तव्यों की जिस तरह अनदेखी कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि नक्सलवाद़ी, आतंकवादी और इनमें कोई अंतर नहीं रह जाता । एक तरह से दोनों ही दल भिंडरावाले की राह पर चल पड़े हैं । जो खून खराबे पर जाकर खत्म होती है । जहां इन्हें अशिक्षित, कमजोर, पिछड़े, दलित और अक्षम वर्गों की मदद करनी चाहिए वहीं, ये दल इन वर्गों को मराठी गैरमराठी के पचड़े में फंसाकर खुद का हित साध रहे हैं और संविधान का उपहास उड़ा रहे हैं । हो सकता है कि इनकी इस हरकत को देखते हुए कश्मीरी – गैर कश्मीरी की नई जंग शुरू हो जाए...और हर राज्य में इसी तरह की भावनाएं जन्म लेने लगें । ऐसा होता है तो देश को बचाना किसी के बूते की बात नहीं रह जाएगी ।
*मालूम होता है देश की संवैधानिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का बीड़ा एमएनएस और शिवसेना ने ही उठा रहा है । देश को टुकड़ो में बांटने की भावना रखने वाले एमएनएस और शिवसेना को कठोर दंड दिए जाने की जरूरत है ताकि फिर कोई ऐसी हरकत करने की कोशिश भी ना कर सके । इन दलों के कार्यकर्ता सिरफिरे असामाजिक तत्व हैं । जिन पर मुकदमा चलाए जाने की भी जरूरत है । यूं तो हमारे देश में हर वक्त समानता की बात की जाती है लेकिन इस समानता के अधिकार के साथ एमएनएस और शिवसेना बलात्कार कर रहे हैं । फिर भी कोई कुछ कहने के लिए तैयार नहीं । बाला साहिब ठाकरे लोगों को भड़काकर एक सत्ता पाने का एक ऐसा रंगीन सपना देख रहे हैं जो अब कभी पूरा नहीं हो सकता । क्योंकि उन्होंने आम गरीब भारतीय की भावनाओँ को आहत किया है । दोबारा ये दल सही रास्ते पर आएँगे इस बात की भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती । और भविष्य में इनका विरोध करने का तरीका हिंसा से परिपूर्ण ही रहने की उम्मीद है । देश जान चुका है कि इनके इरादे नेक नहीं...इसीलिए विधानसभा चुनाव में जनता शिवसेना को सबक सिखा चुकी है । अवसरवाद इन दलों का गहना है । और कानून तोड़ना इनकी आदत और आम आदमी को ठगना इनका पेशा । जिस आजादी के लिए हमारे शहीदों ने खून बहाकर बलिदान दिया उस आजादी के साथ एमएनएस और शिवसेना खिलबाड़ कर रहे हैं । कहीं, ऐसा ना हो कि भाषा, धर्म, क्षेत्र, जाति के नाम पर देश फिर टुकड़ों-टुकड़ों में बंट जाए और शहीदों का बलिदान बेकार साबित हो ।

*महाराष्ट्र में रोजगार की तलाश में जाने वाले युवाओं को इन दलों के नेता दुत्कार रहे हैं । और उनकी आवश्यकताओँ का उपहास उड़ा रहे हैं । जबकि आज के युवा बेरोजगारों पर विपत्तियों का पहाड़ टूट रहा है । बेरोजगार दोहरी मार झेलने पर विवश है रोजगार के लिए इन दलों के प्रभाव क्षेत्र वाले इलाकों में जाने में आम भारतीय खौफजदा रहता है । आम भारतीय युवा जो भारत में जन्मा है...उसे महाराष्ट्र में शराफत से जीवकोपार्जन के लिए जाने से रोका जा रहा है । जबकि हर आम भारतीय युवा को इसकी संवैधानिक स्वतंत्रता है .। ऐसे में अगर कानून ने आम भारतीय युवा को उसका अधिकार नहीं दिलाया तो उसका कानून और संवैधानिक संस्थाओं से विश्वास उठ भी सकता है और फिर आज युवाओँ को गलत रास्ते पर जाने से रोकना मुश्किल होगा ।


* हालांकि इन्हें पहले भी वक्त वक्त पर इनके किए गए कार्यों के लिए चेताया जा चुका है लेकिन नतीजा सभी के सामने है । इनके बढ़ते हौंसलों ने देश में अशांति का माहौल कायम किया है । वैसे तो इन लोगों को केवल मारपीट की ही भाषा समझ आती है कहीं, इन्हें इसी भाषा में जवाब मिलना शुरू हो गया तो देश में कानून-व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल होगा । क्यों कि सभी जानते हैं कि शिवसेना और एमएनएस निरंकुश हो चुकी हैं और निरंकुशता विद्रोह को जन्म देती है । डर इस बात का है कि कहीं इन दलों के गुंडों को इन्हीं की भाषा में मारपीट कर जवाब दिया जाने लगा तो स्थिति असामान्य हो जाएगी । जिसे संभाल पाना काफी मुश्किल होगा । क्यों कि बर्दाश्त की भी कोई सीमा होती है । हमारी संवैधानिक व्यवस्था इनके सिद्धांतों के खिलाफ है ।

* देश की जनता इन्हें दुत्कार चुकी है और आम आदमी को अहसास है वो मिलजुलकर चाहे तो कभी भी इन दलों को सबक सिखा सकता है लेकिन अगर इन्हें कानूनी तरीके से काबू किया जाए तो बेहतर होगा । आम आदमी इनकी चालबाजियों को समझ चुका है । मगर इन दलों को आगाह किया जाना जरूरी है कि आम आदमी का गुस्सा फूटा तो इन्हें बचने के लिए कहीं जगह नहीं मिलेगी ।



*अफसोस की बात ये है कि इनके सामने देश का कानून भी पंगु बना हुआ है....। अभी तक इन दलों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की गई । और ना ही आयोग ने इस बिषय में कोई संज्ञान लेकर कार्रवाई की । जबकि शिवसैनिक और एमएनएस के गुंड़े साफ कहते देखे जाते है कि भारतीय से बढ़कर इनके लिए मराठी मानुष और इनके पार्टी सुप्रीमो यानी बाला साहिब और राज ठाकरे हैं ।


* मुझे नहीं लगता है कि आपको इनके द्वारा की गई सभी और भी भड़काऊ बयानबाजी या घटनाओं का जिक्र करने की जरूरत हैं क्यों कि सच क्या है पूरा देश जानता है । ऐसे में अगर बेलगाम बैल की तरह इधर उधर सींग मार रहे दोनों दलों को बैन नहीं किया गया तो आने वाले वक्त में देश को बड़ी मुसीबतों से जूझना पड़ सकता है । इन दलों के तालिबानी फरमानों से आम आदमी तंग आ चुका है। इनके किए गए कार्य किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ।


बड़ा सवाल ये है कि.....राष्ट्रभाषा का अपमान करने वाले और सरेआम गुंडागर्दी करने वाली राजनैतिक पार्टियों की मान्यता अभी तक रद्द क्यों नहीं की गई..?
*इतना ही नहीं, इन दोनों दलों की तरफ से बार बार कहा जाता है कि इनके लिए राष्ट्रीयता से पहले इनके नेता हैं......तो फिर क्यों नहीं इनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाता...?
*लोकतांत्रिक देश के सदन में राष्ट्रभाषा बोलने पर पिटाई कर दी जाती है....देश के लोकतंत्र और राष्ट्रभाषा का इससे बड़ा और अपमान क्या हो सकता है....ऐसे दलों को सदन में बैठने का अधिकार क्यों दिया गया है...?


महाराष्ट्र नव निर्माण सेना और शिवसेना दोनों दलों की अभी तक की गई हरकतें इनका आचरण खुद बयान करतीं हैं और बतातीं है कि इन दलों को भारतीय लोकतंत्र में राजनैतिक पार्टी का दर्जी दिया जाना...आम आदमी के साथ भारी अन्याय होगा । महाराष्ट्र नव निर्माण सेना और शिवसेना की काली करतूतों का काला चिट्ठा लिखना काफी मुश्किल है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता । इनके पाप का घड़ा इतना भर चुका है कि अब रिसने लगा है और कई वारदातें सामने ही नहीं आ पातीं ।

जो देश के विश्वसनीय कई समाचार पत्रों की खबरों से आप खुद सच्चाई का अंदाजा लगा सकते हैं इसलिए मैं ज्यादा कुछ लिखना अब नहीं चाहूंगा क्यों कि मुझे लगता है कि पत्र में आपको सच्चाई से अवगत कराने के लिए पहले ही मैं काफी कुछ कह चुका हूं । फिर भी अगर आप आवश्यक समझें तो मुझे उन समाचार पत्रों के अँश पेश करने में कोई दिक्कत नहीं होगी, जो हमेशा से इनकी प्रताड़ना के वाबजूद सच्चाई छाप रहे हैं और निर्भीकता से अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं ।



अतः इन परिस्थितियों में आपसे प्रार्थना है कि—

इसलिए जनहित और न्यायहित में जल्द से जल्द इन दोनों दलों को बैन किया जाए और इनकी राजनैतिक पार्टी के रूप में मान्यता रद्द की जाए...ताकि इस देश में आम आदमी सुरक्षित शांति और अमन के साथ रह सके ।

प्रार्थीगण---






दिनांक----

प्रतिलिपि- जानकारी और आवश्यक कार्यवाही के निवेदन के साथ प्रस्तुत है ।
श्रीमति सोनिया गांधी और अन्य कई जाने माने लोग

Friday, November 20, 2009

कब तक पंगु बना रहेगा कानून ?





मुंबई में शिवसैनिकों और एमएनएस की गुंडागर्दी लगातार जारी है... इन दोनों दलों ने अभी तक ही अपनी काली करतूतों से लोकतंत्र का मजाक उड़ाया है। लेकिन हद तब हो गई जब लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर भी शिवसैनिकों ने धावा बोल दिया....। .इन दलों की अभी तक की हरकतें साफ बयां कर रही हैं कि आए दिन किस तरह दोनों दल लोकतंत्र, संविधान और कानून को ठोकर मार रहे हैं...। पिछले दिनों एमएनएस ने महाराष्ट्र विधानसभा में मारपीट की....और अब शिवसेना ने मीडिया के दफ्तर पर ही हमला बोल दिया। यानी दोनों दल लोकतंत्र को निशाना बनाने में पीछे नहीं रहना चाहते और इन ओछी हरकतों से क्षेत्रीय सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं । अफसोस की बात ये है कि इनके सामने देश का कानून भी पंगु बना हुआ है....। जनता के जरिए लोकतंत्र के दरबार तक पहुंचने वालों ने ही लोकतंत्र को लाचार कर दिया है। ये कभी राष्ट्रभाषा का अपमान करते हैं तो कभी, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पर हमला बोल देते हैं। खुलेआम संविधान और कानून की मर्यादा तार-तार हो रही है। आखिर कब तक कानून इनके आगे पंगु बना रहेगा...सबसे बड़ा सवाल ये है कि.....राष्ट्रभाषा का अपमान करने वाले और सरेआम गुंडागर्दी करने वाली राजनैतिक पार्टियों की मान्यता अभी तक रद्द क्यों नहीं की गई..? इतना ही नहीं, इन दोनों दलों की तरफ से बार बार कहा जाता है कि इनके लिए राष्ट्रीयता से पहले इनके नेता हैं......तो फिर क्यों नहीं इनके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाता...? इस लोकतांत्रिक देश के सदन में राष्ट्रभाषा बोलने पर पिटाई कर दी जाती है....देश के लोकतंत्र और राष्ट्रभाषा का इससे बड़ा और अपमान क्या हो सकता है....ऐसे दलों को सदन में बैठने का अधिकार क्यों दिया गया है...? लोकतंत्र पर बार बार हमला करके भी जब इनका मन नहीं भरा तो उन्होंने खिसियाहट में मीडिया को भी निशाना बना डाला....। और मीडिया को हाईजैक करने की कोशिश की....। वैसे भी इन लोगों को केवल मारपीट की ही भाषा समझ आती है इसलिए बेहतर होगा कि इनसे भी इसी भाषा में बातचीत की जाए....।

सौरभ दुबे, 9210985314



Wednesday, September 30, 2009

बेवफा सनम का था गम

आसमां की रानी हो, तुम कहां से आई हो
आज मुझको ये बताओ, तुम मुझे क्या लाई हो
प्यार है हमें तुमसे, दूर नहीं तुम हमसे
अब तो तुम आ जाओ, और मुझे ना तड़पाओ
मैंने तुमको देखा है, नाम भी तेरा रेखा है
तुझको देख मुझको ऐसा, लगता नहीं तू धोखा है
जिंदगी मुझको डसती है, गुनाह वो मुझको लगती है
पता नहीं तुम आओगे या मुझको तड़पाओगे
बहारों की तुम मल्लिका, ठंडी हवा का तुम झोंका
प्यार में तेरे पागल हैं, तेरे लिए हम घायल हैं
जानते हैं हम तो ये, दुश्मन नहीं तुम दोस्त मेरे
फिर क्या हुआ..?
ये क्यों हुआ..?
कैसे हुआ ..?
ये कब हुआ ..?
तुमने जो हमसे कहा, वो कैसे झूठ हुआ
अगर तुमको डर था सबका
प्यार में दिन क्यो था भटका
-------------सौरभ दुबे

Tuesday, September 29, 2009

निराशा

जब बढ़ते हैं कदम मंजिल की ओर
घुस जाती है ये मन में बनकर चोर
जीवन में काली छाया बनकर
बन जाती है घटा घनघोर
देती है जीवन को चुनौति
करती है जीवन में कटौती
होती है ये परीक्षा का प्रतिबिंब
करा देती है प्रजल्पना
स्वरूप निराशा का ये निराला है
इसमें फंस जाओ तो समझो मुंह काला है
निश्चित ही इसे एक बुरा क्षण मानो
लेकिन देखो, समझो जानो और पहचानो
पहचानने पर पता लगेगा तुमको
ये कुछ नहीं छल रही है तुमको
इससे पहले कि ये छल ले तुमको
उठाओ लाठी दूर भगाओ इसको
ना भागे तो निठल्लापन अपनाओ
निराशा नामक इस धूर्त कुतिया को दूर भगाओ
------सौरभ दुबे

Monday, September 28, 2009

रावण ने पेश की सफाई

दशहरे का दिन था, मैदान में भीड़ भारी थी
थोड़ी ही देर में रावण दहन की तैयारी थी
तभी अचानक जोर से एक आवाज आई
मुझे हर साल क्यों जलाते हो मेरे भाई



रावण बोला –
आखिर मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है....
इस दौर में मैंने तुम्हारा क्या उखाड़ा है...
जो तुम मुझे हर साल जलाते हो
मेरे जलने पर हमेशा खुशी मनाते हो
मैं तो सीता को लंका की रानी बनाने लाया था
राम ने तो सीता का त्याग करने को छुड़ाया था
मैंने राम से दुश्मनी तो पहले नहीं पाली थी
लक्ष्मण ने ही मेरी बहन की नाक काट डाली थी
ना ही मैंने अयोध्या में कोई आतंकी हमला करवाया है
राम राज्य बाद ही यहां आतंक का साया आया है
ये राम राज वालों ने ही सबकुछ करवाया है
मेरे सुंदर देश को टुक़डों टुकड़ों में बंटवाया है ।


मैंने लालू की तरह किसी का चारा तो नहीं खाया है
ना ही मोदी बनकर हिंदू-मुस्लिम को लड़वाया है ।
माया की तरह ताज कॉरीडोर घोटाला भी नहीं करवाया है
आमलोगों का पैसा हाथी घोड़ों की मूर्तियों में नहीं उड़ाया है



मैंने अपने राज्य में भ्रूण हत्याएं तो नहीं करवाईं हैं
महंगाई और भुखमरी तो मुझे जलाने के बाद आईं हैं
मुझे तो तुम हर साल की तरह इस बार भी जला पाओगे
लेकिन क्या भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को भगा पाओगे


रावण की बांते सुनकर लोगों ने हैरानी जताई
लेकिन रावण ने जारी रखी पेश करना अपनी सफाई
रावण बोला -






चोरी, लूट, डकैती, हत्या तो मैं नहीं करता हूं
मैं तो भगवान शिव शंकर की पूजा करता हूं
मेरे राज्य में कोई न्याय से वंचित नहीं रहता था
ना ही कोई तारीख पर तारीख कहता था
लंका में लोग स्वाइन फ्लू से नहीं मरते थे
सुषेण जैसे बैघ उनके स्वास्थ्य का ख्याल करते थे
मुझे राज्य मिलता तो सोने की सीढ़ी बनवा देता
इस धरती के लोगों को भी स्वर्ग की सैर करा देता़
अशिक्षा, रैगिंग, छुआछूत तुमहीं फैलाते हो
मुझ जैसे ज्ञानी को हर साल आग लगाते हो
क्यों कि आग लगाने की आदत तुम्हारी पुरानी है
आखिर आरक्षण की आग भी तो तुम्हें फैलानी है
मैंने वरुण गांधी की तरह लोगों को नहीं भड़काया है
महामारी, बाढ़ आपदा राम राज्य लेकर आया है
फिर भी तुम सब राम के गुण गाते हो
और हर साल मुझे इसी तरह जलाते हो
लेकिन आतंक के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हो
क्या मुझे जलाकर बुराई को मिटा पाओगे
फर्जी मुठभेड़ों से इशरत जैसों को बचा पाओगे
क्या दहेज की बीमारी से समाज से छुड़ा पाओगे
निठारी के मासूम बच्चों को अब वापस ला पाओगे
इतना सब जानकर क्या बुराई मिटा पाओगे
थोड़ा बहुत सोचकर घर जाकर सो जाओगे
-------------सौरभ दुबे, आजाद न्यूज